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NCERT कक्षा-11, पाठ-1, “वेदामृतम्” का सरलार्थ
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NCERT कक्षा-11, पाठ-1, “वेदामृतम्” का सरलार्थ
पाठ-लेखः · Lesson script
मंत्र - 1.
सङ्गच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम् ।
देवा भागं यथा पूर्वे सञ्जानाना उपासते ।। 1।। (ऋग्वेद 10-191-2)
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अन्वयः -(हे जनाः) सं गच्छध्वम् । सं वदध्वम्, वः मनांसि सं जानताम् । यथा पूर्वे देवाः संजानाना भागम् उपासते (तथैव यूयं कुरुतः)।
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प्रसंग - प्रस्तुत मंत्र हमारी संस्कृत की पाठ्य-पुस्तक 'शाश्वती भाग-1' के 'वेदामृतम्' नामक पाठ से लिया गया है। यह मंत्र 'ऋग्वेद' के दसवें मंडल के 191 वें सूक्त से संकलित है।
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सरलार्थ - हे मनुष्यों ! (हम सब ) साथ चलें। (हम सब ) एक समान बोलें। तुम्हारे मन समान रूप से अर्थबोध करें अर्थात् जानें। जिस प्रकार पूर्वकाल में देवगण एकमत होते हुए (यज्ञ के) भाग को स्वीकार करते थे (उसी प्रकार तुम भी एकमत होकर जीवन-यापन करो ) ।
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मंत्र - 2.
समानी व आकूतिः समाना हृदयानि वः।
समानमस्तु वो मनो यथा वः सुसहासति ॥ (ऋ. 10-191-4)
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अन्वयः - (हे जनाः) वः आकूतिः समानी, वः हृदयानि समाना, वः मनः समानम् अस्तु, यथा वः सुसह असति ।
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प्रसंग - प्रस्तुत मंत्र हमारी संस्कृत की पाठ्य-पुस्तक 'शाश्वती भाग-1' के 'वेदामृतम्' नामक पाठ से लिया गया है। यह मंत्र 'ऋग्वेद' के दसवें मंडल के 191 वें सूक्त से संकलित है।
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सरलार्थ - हे मनुष्यों ! तुम्हारे संकल्प समान हों। तुम्हारे हृदय समान हों। तुम्हारा मन समान हो जिससे तुम्हारी सुन्दर संगति हो जाए।
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मंत्र - 3.
मधु वाता ऋतायते मधु क्षरन्ति सिन्धवः ।
माध्वीर्नः सन्त्वोषधीः ।। (ऋग्वेद 1-90-7)
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अन्वय - (हे नराः) ऋतायते वाताः मधु (वान्ति), सिन्धवः मधु क्षरन्ति । नः औषधीः माध्वीः सन्तु ।
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प्रसंग - प्रस्तुत मंत्र हमारी संस्कृत की पाठ्य-पुस्तक 'शाश्वती भाग-1' के 'वेदामृतम्' नामक पाठ से लिया गया है। यह मंत्र 'ऋग्वेद' के पहले मंडल के 90 वें सूक्त से संकलित है।
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सरलार्थ - हे मनुष्यों ! जिस प्रकार यज्ञ की कामना करने वाले यजमान के लिए वायु माधुर्य से युक्त होकर बहती हैं, आकाशीय समुद्र अर्थात् जल बरसाने वाले मेघ माधुर्य से युक्त होकर जल बरसाते हैं। उसी प्रकार हमारे लिए वनस्पतियाँ भी माधुर्य से युक्त हों अर्थात् स्वास्थ्य प्रदान करने वाली हों।
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मंत्र - 4.
यजाग्रतो दूरमुदैति दैवं
तदु सुप्तस्य तथैवैति।
दूरङ्गमञ्ज्योतिषां ज्योतिरेकं
तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु ।। (यजुर्वेद 34-1)
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अन्वयः - यत् दैवं (मनः) जाग्रतः (जनस्य) दूरम् उदैति । तद् उ (मनः) सुप्तस्य (जनस्य) तथा एव एति। (यत् मनः) ज्योतिषां दूरङ्गमम् एकं ज्योतिः (अस्ति), तत् मे मनः शिवसङ्कल्पम् अस्तु ।
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प्रसंग - प्रस्तुत मंत्र हमारी संस्कृत की पाठ्य-पुस्तक 'शाश्वती भाग-1' के 'वेदामृतम्' नामक पाठ से लिया गया है। यह मंत्र 'यजुर्वेद' से संकलित है।
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सरलार्थ – मुझ जागते हुए का जो दिव्य विज्ञानयुक्त मन दूर भाग जाता है, वही सोते हुए का उसी प्रकार ही भाग जाता है। वह विषयों का प्रकाशन करने वाली इन्द्रियों में एकमात्र प्रकाशक तथा दूर-दूर तक पहुँचने वाला मेरा मन कल्याणकारी विचार वाला होवे ।
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मंत्र - 5.
तच्चक्षुर्देवहितं पुरस्ताच्छुक्रमुच्चरत्
पश्येम शरदः शतं जीवेम शरदः शतम् ।।
शृणुयाम शरदः शतं प्रब्रवाम शरदः शतम्
अदीनाः स्याम शरदः शतं भूयश्च शरदः शतात् ।। (यजुर्वेद 36-24)
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अन्वयः - तत् चक्षुः देवहितं शुक्रम् पुरस्तात् उच्चरत् । शतं शरदः पश्येम । शतं शरदः जीवेम । शतं शरदः शृणुयाम । शतं शरदः प्रब्रवाम । शतं शरदः अदीनाः स्याम। शतात् शरदः भूयः च ।
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प्रसंग - प्रस्तुत मंत्र हमारी संस्कृत की पाठ्य-पुस्तक 'शाश्वती भाग-1' के 'वेदामृतम्' नामक पाठ से लिया गया है। यह मंत्र 'यजुर्वेद' से संकलित है।
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सरलार्थ — वह दिव्य प्रकाश को धारण किए हुए, सबको दृष्टि प्रदान करने वाला, शुद्ध-प्रकाशस्वरूप सूर्य पूर्व दिशा में उदित हुआ है। (हे प्रभु! हम आपकी कृपा से) सौ वर्षों तक देखते रहें, सौ वर्षों तक जीवित रहें, सौ वर्षों तक सुनते रहें। सौ वर्षों तक अच्छी तरह बोलते रहें। सौ वर्षों तक और फिर सौ वर्षों से भी अधिक वर्षों तक दीनता से रहित होकर जीवन-यापन करें।
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मंत्र - 6.
जनं बिभ्रती बहुधा विवाचसम्
नानाधर्माणं पृथिवी यथौकसम् ।
सहस्रं धारा द्रविणस्य मे दुहां
ध्रुवेव धेनुरनुपस्फुरन्ती ।।6।। (अथर्ववेद - पृथिवीसूक्तम् 12-1-45)
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अन्वयः - बहुधा विवाचसं नानाधर्माणं जनं यथा ओकसं बिभ्रती पृथिवी, ध्रुवा अनुपस्फुरन्ती धेनुः इव, मे द्रविणस्य सहस्रं धारा दुहाम् ।
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प्रसंग - प्रस्तुत मंत्र हमारी संस्कृत की पाठ्य-पुस्तक 'शाश्वती भाग-1' के 'वेदामृतम्' नामक पाठ से लिया गया है। यह मंत्र 'अथर्ववेद' के 'पृथिवीसूक्तम्' से संकलित है।
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सरलार्थ - अनेक प्रकार से विभिन्न भाषाओं को बोलने वाले, अनेक प्रकार के धर्मों का पालन करने वाले लोगों को समान घर में रहने की भाँति धारण करती हुई कम्पनरहित स्थिर धरती गाय की तरह मेरे लिए धन की हज़ार धाराओं को बहा दे ।
सङ्गच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम् ।
देवा भागं यथा पूर्वे सञ्जानाना उपासते ।। 1।। (ऋग्वेद 10-191-2)
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अन्वयः -(हे जनाः) सं गच्छध्वम् । सं वदध्वम्, वः मनांसि सं जानताम् । यथा पूर्वे देवाः संजानाना भागम् उपासते (तथैव यूयं कुरुतः)।
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प्रसंग - प्रस्तुत मंत्र हमारी संस्कृत की पाठ्य-पुस्तक 'शाश्वती भाग-1' के 'वेदामृतम्' नामक पाठ से लिया गया है। यह मंत्र 'ऋग्वेद' के दसवें मंडल के 191 वें सूक्त से संकलित है।
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सरलार्थ - हे मनुष्यों ! (हम सब ) साथ चलें। (हम सब ) एक समान बोलें। तुम्हारे मन समान रूप से अर्थबोध करें अर्थात् जानें। जिस प्रकार पूर्वकाल में देवगण एकमत होते हुए (यज्ञ के) भाग को स्वीकार करते थे (उसी प्रकार तुम भी एकमत होकर जीवन-यापन करो ) ।
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मंत्र - 2.
समानी व आकूतिः समाना हृदयानि वः।
समानमस्तु वो मनो यथा वः सुसहासति ॥ (ऋ. 10-191-4)
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अन्वयः - (हे जनाः) वः आकूतिः समानी, वः हृदयानि समाना, वः मनः समानम् अस्तु, यथा वः सुसह असति ।
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प्रसंग - प्रस्तुत मंत्र हमारी संस्कृत की पाठ्य-पुस्तक 'शाश्वती भाग-1' के 'वेदामृतम्' नामक पाठ से लिया गया है। यह मंत्र 'ऋग्वेद' के दसवें मंडल के 191 वें सूक्त से संकलित है।
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सरलार्थ - हे मनुष्यों ! तुम्हारे संकल्प समान हों। तुम्हारे हृदय समान हों। तुम्हारा मन समान हो जिससे तुम्हारी सुन्दर संगति हो जाए।
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मंत्र - 3.
मधु वाता ऋतायते मधु क्षरन्ति सिन्धवः ।
माध्वीर्नः सन्त्वोषधीः ।। (ऋग्वेद 1-90-7)
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अन्वय - (हे नराः) ऋतायते वाताः मधु (वान्ति), सिन्धवः मधु क्षरन्ति । नः औषधीः माध्वीः सन्तु ।
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प्रसंग - प्रस्तुत मंत्र हमारी संस्कृत की पाठ्य-पुस्तक 'शाश्वती भाग-1' के 'वेदामृतम्' नामक पाठ से लिया गया है। यह मंत्र 'ऋग्वेद' के पहले मंडल के 90 वें सूक्त से संकलित है।
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सरलार्थ - हे मनुष्यों ! जिस प्रकार यज्ञ की कामना करने वाले यजमान के लिए वायु माधुर्य से युक्त होकर बहती हैं, आकाशीय समुद्र अर्थात् जल बरसाने वाले मेघ माधुर्य से युक्त होकर जल बरसाते हैं। उसी प्रकार हमारे लिए वनस्पतियाँ भी माधुर्य से युक्त हों अर्थात् स्वास्थ्य प्रदान करने वाली हों।
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मंत्र - 4.
यजाग्रतो दूरमुदैति दैवं
तदु सुप्तस्य तथैवैति।
दूरङ्गमञ्ज्योतिषां ज्योतिरेकं
तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु ।। (यजुर्वेद 34-1)
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अन्वयः - यत् दैवं (मनः) जाग्रतः (जनस्य) दूरम् उदैति । तद् उ (मनः) सुप्तस्य (जनस्य) तथा एव एति। (यत् मनः) ज्योतिषां दूरङ्गमम् एकं ज्योतिः (अस्ति), तत् मे मनः शिवसङ्कल्पम् अस्तु ।
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प्रसंग - प्रस्तुत मंत्र हमारी संस्कृत की पाठ्य-पुस्तक 'शाश्वती भाग-1' के 'वेदामृतम्' नामक पाठ से लिया गया है। यह मंत्र 'यजुर्वेद' से संकलित है।
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सरलार्थ – मुझ जागते हुए का जो दिव्य विज्ञानयुक्त मन दूर भाग जाता है, वही सोते हुए का उसी प्रकार ही भाग जाता है। वह विषयों का प्रकाशन करने वाली इन्द्रियों में एकमात्र प्रकाशक तथा दूर-दूर तक पहुँचने वाला मेरा मन कल्याणकारी विचार वाला होवे ।
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मंत्र - 5.
तच्चक्षुर्देवहितं पुरस्ताच्छुक्रमुच्चरत्
पश्येम शरदः शतं जीवेम शरदः शतम् ।।
शृणुयाम शरदः शतं प्रब्रवाम शरदः शतम्
अदीनाः स्याम शरदः शतं भूयश्च शरदः शतात् ।। (यजुर्वेद 36-24)
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अन्वयः - तत् चक्षुः देवहितं शुक्रम् पुरस्तात् उच्चरत् । शतं शरदः पश्येम । शतं शरदः जीवेम । शतं शरदः शृणुयाम । शतं शरदः प्रब्रवाम । शतं शरदः अदीनाः स्याम। शतात् शरदः भूयः च ।
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प्रसंग - प्रस्तुत मंत्र हमारी संस्कृत की पाठ्य-पुस्तक 'शाश्वती भाग-1' के 'वेदामृतम्' नामक पाठ से लिया गया है। यह मंत्र 'यजुर्वेद' से संकलित है।
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सरलार्थ — वह दिव्य प्रकाश को धारण किए हुए, सबको दृष्टि प्रदान करने वाला, शुद्ध-प्रकाशस्वरूप सूर्य पूर्व दिशा में उदित हुआ है। (हे प्रभु! हम आपकी कृपा से) सौ वर्षों तक देखते रहें, सौ वर्षों तक जीवित रहें, सौ वर्षों तक सुनते रहें। सौ वर्षों तक अच्छी तरह बोलते रहें। सौ वर्षों तक और फिर सौ वर्षों से भी अधिक वर्षों तक दीनता से रहित होकर जीवन-यापन करें।
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मंत्र - 6.
जनं बिभ्रती बहुधा विवाचसम्
नानाधर्माणं पृथिवी यथौकसम् ।
सहस्रं धारा द्रविणस्य मे दुहां
ध्रुवेव धेनुरनुपस्फुरन्ती ।।6।। (अथर्ववेद - पृथिवीसूक्तम् 12-1-45)
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अन्वयः - बहुधा विवाचसं नानाधर्माणं जनं यथा ओकसं बिभ्रती पृथिवी, ध्रुवा अनुपस्फुरन्ती धेनुः इव, मे द्रविणस्य सहस्रं धारा दुहाम् ।
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प्रसंग - प्रस्तुत मंत्र हमारी संस्कृत की पाठ्य-पुस्तक 'शाश्वती भाग-1' के 'वेदामृतम्' नामक पाठ से लिया गया है। यह मंत्र 'अथर्ववेद' के 'पृथिवीसूक्तम्' से संकलित है।
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सरलार्थ - अनेक प्रकार से विभिन्न भाषाओं को बोलने वाले, अनेक प्रकार के धर्मों का पालन करने वाले लोगों को समान घर में रहने की भाँति धारण करती हुई कम्पनरहित स्थिर धरती गाय की तरह मेरे लिए धन की हज़ार धाराओं को बहा दे ।
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